कवर्धा अंचल के साहित्यकार नीरज मनजीत का रचना संसार
कावेरी जायसवाल
सहायक प्राध्यापक हिन्दी, स्व. बिन्देश्वरी बघेल शास. महाविद्यालय, कुम्हारी, दुर्ग, छत्तीसगढ़, भारत
*Corresponding Author E-mail: kaveri3233@gmail.com
ABSTRACT:
कवर्धा अंचल ही नहीं अपितु पूरे छत्तीसगढ़ के विख्यात साहित्यकारों में गिने जाने वाले नीरज मनजीत जी का जन्म 26 मई 1952 को कवर्धा अंचल में हुआ। मनजीत जी ने 1970 से ही नियमित लेखन प्रारंभ कर दिया था। मनजीत जी साहित्यकार ही नहीं संवेदनशील व सजग पत्रकार व ब्लागर भी है। इनके रचनाओं में सामाजिक यथार्थ मानवीय मूल्यए वैयक्तिक संबंध का चित्रण तो मिलता ही है, प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य, प्रेम, अध्यात्म, विज्ञान, खेलकूद सभी का समावेश है, जिसकों पढ़ने वाला इनकी रचना संसार को देखकर अभिभूत हो जाएगा।
नीरज मनजीत का साहित्यिक दुनिया उनके सबल व्यक्तित्व एवं गहन अनुभव युक्त जीवन का परिणाम है। इनका जीवन अकृत्रिम एवं स्पष्ट है, जीवन के जिन स्रोतों से मंजीत जी का साहित्य उद्भूत हुआ है और जिन तत्वों को लेकर वे तरंगायित है उनको बिना समझे उनके साहित्य के गूढ़ तत्वों को समझना असंभव है। ये समसामयिक, राजनीतिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय घटनाचक्र, खेल सिनेमा, कारोबार इत्यादि अनेक विषयों पर अपना विचार लेख के माध्यम से भी रखते है।
KEYWORDS: सामाजिक यथार्थ, मानवीय मूल्य, वैयक्तिक संबंध, संवेदनशीलता, पारदर्शिता, मधुरता इत्यादि
INTRODUCTION:
मनजीत जी की कविताएँ प्रकृति व ज्ञान तथा प्रेम की त्रिपथगा बहाकर सात्विक भाव की ओर प्रेरित करने का प्रयास करती है। मनजीत जी कभी प्रकृति के साथ, कभी उस असीम के साथ के साथ जुड़कर अपनी अंतरात्मा के साथ तारतम्य स्थापित करते हैं। इनकी रचनाओं में, संवेदनशीलताएपारदर्शिता मधुरता, ओजस्विता, मादकता एवं निःछलता की इन्द्रधनुषी छटा दिखलायी पड़ती है, जो अत्यंत ही दुर्लभ होती हैं।
कविता नीलमणि में कवि ने विभिन्न भावों की अभिव्यक्ति की है। जिसमें अध्यात्म और प्रेम, विज्ञान और प्रेम, प्रेम और प्रकृति, अंतर्दृद्ध और कोविड काल में कविता तथा कुछ और कविताएँ जो खण्डों में विभक्त है। कवि की अध्यात्म व प्रेम की कविताएँ दार्शनिकता को अभिव्यक्त करती है। जिसमें कहीं-कहीं अभिधा शैली में उस असीम के समक्ष समर्पण या सहज संबंध का आभास होता है।
यथा :-
मौन के शिलाखण्डों पर
पग रखते हुए मैं
तुम्हारे आलय में
विलंब से ही सही
चला आया देव !
तुम्हारी जय करते
भक्तों का जुलुस लौट चुका है
और मौन शिलाग्रह के
इस अविरल एकांत में
तुम भी उसी तरह एकांकी हो गए हो
जिस तरह
अपने अंतर्मन में बिखरे
शिलाखण्डों के बीच में
कवि की विज्ञान व प्रेम से संबंधित कवितायें वैज्ञानिक तत्वों के साथ ही साथ प्रकृति से संबंधित दुनिया का भी आभास कराती है अर्थात वैज्ञानिक तत्वों के साथ ही प्रकृति की दुनिया दिखलाई देने लगेंगी अर्थात वैज्ञानिक तत्वों के साथ ही प्रकृति की संपृक्त कवितायेँ भी शामिल हैं।
यथा :-
यदि सब कुछ संभव होता
तो हमारा ब्राह्माण्ड
भौतिकी की कुछ तय संविधियों से
नहीं चल रहा होता
न प्रकाश की रफ्तार तय होती
न आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत .
इसी तरह
दूध में मिले जल की कहानी
तुम बताने लगी तो
कह सकते हो कि
यह नदी से टूटकर गिर, हॉ
जल की टुकड़ों को कथा
कवि की प्रेम और प्रकृति की कविताएँ छायावादी कविताओं का आभास कराती है, जिसमें सौन्दर्य, प्रकृति विधान के साथ ही स्वानुभूति की विवृत्ति भी है।
ऊपर श्वेत-सुनहरी बालू के किनारे
अपनी लहरों पे तैरता है
आकर्षक नीला-हरा समुद्र।
गैलेक्सी की आँख में दमकता नीलमणि !
मुझे पता है ..
तुम हो तो प्रकृति हो
और तुमने हो तो हरा-नीला शीशा पिघलाकर
समुद्र में डाल दिया है!
मनजीत जी अंतर्द्वंद के साथ को बड़ी आत्मीयता के साथ बतलाया है। स्थूल के भीतर सूक्ष्म और मुखौटे के भीतर असलीयत की पहचान के साथ ही नये बिंबों व प्रतीकों का प्रयोग बड़ी खूबसूरती के साथ किया गया है। कवि ने अपनी कविताओं में विभिन्न विचार-भाव के अंतर्द्वंद में फंसे दिखते हैए किन्तु वह किसी न किसी प्रकार से अंतर्द्वंद से निकलकर अवश्य आ जाते हैं।
यथा :-
अपनी अलमारी में
बरसों से पड़ी फाइलों
और किताबों के बीच दबे
टूटे कागज के पन्नों पर
अक्सर तुम ढूंढते हो
तुमने लिखी थी जो
वह कविता
और तुम भी खो चुके हो
इस वह भी वक्त के
अंधेरों में
कविताएँ अभी भी
लिखी जा रही है
मानवता के पक्ष में
प्यार के नाम
नफरत के विरूद्ध।
कवि की इन कविताओं में भावनाएँ, चिंतन एवं विशिष्ट प्रकार की अभिव्यक्ति के दर्शन होते हैं तथा दार्शनिकता, प्रेम, रोमांस के साथ-साथ मानव की मूल प्रकृति अंतर्द्वंद को अभिव्यक्त किये हैं। इनकी लेखनी में गंभीरता, सच्चाई तथा ईमानदारी की झलक स्पष्टरू झलकती है।
मनजीत जी की काव्य संग्रह ग्लेशियर में भी अलग-अलग तरह की कविताओं का संकलन है। जिसमें आध्यात्मिकता, जिंदगी से जुड़ी यादें, सृजन की आकांक्षाएँ, प्रेम की अनुभूति, स्पर्श का एहसास, आकांक्षाओं-महत्वाकांक्षाओं की दुनिया, अंतरिक्ष, आकाशगंगा, चाँद, अफसाना, प्यार, ख्वाब की दुनिया सभी कुछ समाहित है जिसमें इन्होंने हर्ष-विषाद, रूमानी, सुख-दुखए प्रीति-अप्रीति आदि को भी अभिव्यक्त किया है। ये कविताएँ किसी एक भाव-भूमि पर सीमित नहीं है अपितु बहुमुखी है।
वो जो शब्द उसने लिखे थे
वे संख्य सूर्यो के पार
आकाशगंगा के दूसरे छोर
अनजाने ग्रह पर बसी
किसी अनजानी सभ्यता के
वायुमंडल में घुल मिल गये हैं
लेकिन उन शब्दों के स्पर्श
तुम्हारे पास तुम्हारे अंत्तर्मन की
तहों पर कहीं है।
इसी प्रकार प्रेम से भरी कविता-
उठो और देखो
जिंदगी तुम्हारे कमरे की
दहलीज पर खड़ी है
इसके पहले कि
वह लौटकर जाने लगे
उसका हाथ गर्मजोशी से थाम लो
और उसे गले लगाकर
अंदर ले आओ।
नीरज मनजीत की नज्में में चंचलता उत्साह तथा प्रतीकात्मकता देखी जा सकती है। इन्होंने कल्पना के जो रंग भरे हैं, वो इनकी अपनी बौद्धिक उपज है। इनकी कल्पना और निराले अंदाज-ए-बयां ने पुराने विषयों को नये सिरे से जिंदा और प्रफुल्लित बनाया है। जिनको तहजीब, संजीदगी तथा सच्चाई साथ प्रस्तुत किया है।
यथा :-
वो जो आवाजें हमने सुनी है
वो दिल से निकली हैं।
उस भद्रः मोहतरमा की आवाज भी
दिल से निकली है,
जिसने बाबा नानक से
दोस्ती प्यार मोहब्बत सुख चैन अमन की
दुआ माँगी है
उस फरिश्ते की
उस नेकदिल इंसान की
आवाज भी
दिल से निकली थी
जो अमन का
पैगाम लिए दोस्ती और प्यार की
चिट्ठी लिए
बस में बैठकर
उस पार गया था।
मनजीत जी कभी प्रकृति के साथए कभी उस असीम के साथ जुड़कर अपनी अंतरात्मा के साथ तारतम्य स्थापित करते हैं। इनकी रचनाओं में संवदेनशीलता, पारदर्शिता, मधुरता, मादकता एवं निश्छलता की इन्द्रधनुषी छटा दिखलायी पड़ती है, जो अत्यंत दुर्लभ है। ये कविता में रोमानियत भर देते हैं।
कविता खिलती है कविता में नीरज मनजीत ने प्रकृति और मनुष्य से संबंधित कविता लिखी है, जिसमें द्वंद और तनाव है। लेकिन इनकी कविता में निराशा कदापि नहीं है अपितु सौन्दर्यए उल्लास और जिजीविषा का लगाव व आस्था हैं।
कवि ने कविता खिलती है कविता में केवल कविता/काव्य के खिलने के तात्पर्य से नहीं लिखा बल्कि प्रकृति के उन समस्त जीवों को स्वतंत्र व स्वच्छंद रूप में देखना चाहते हैं।
भूल गया मैं
सुबह की अखबार में पड़ी खबरें
कल संसद में हुई बहस
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के दांव पेंच
तेजी से बदलती दुनिया के बदलते समीकरण
ग्लोबलाईजेशन से मेरी इस दुनिया को
होने वाले फायदे-नुकसान की उलझन।
सुनता रहा मैं
कमरे में भरी किलकारियों
ओ दुनिया मालिकों
यह बच्चा
दुनिया के बगीचे में खिला
एक खुशबूदार-खूबसूरत फूल है
खिलने दो इसे
खेलने दो इसे।
कवि अपनी कविताओं में एक आदमी की तरह बातचीत करते हुए कुछ नया गढ़ने का, कुछ सपनों की दुनिया में जीने की कोशिश करते हुए एक मासूम बच्चे की तरह यथार्थ की दुनिया में लौटकर वापस आ जाता है।
अपने सपनों के रंगीन रंगीन धागों से
मैंने एक शाल चुना
उस पर रेशम और पशमीने के फूल काढ़े
उसमें सूती कपड़े का अस्तर लगाया
और ओढ़कर उसे उड़ चला आसमान की ऊँचाइयो में
बादलों में ऊपर पहुँचा
तो चाँद से मेरी मुलाकात हुई
मैंने उससे कहा दोस्त
सारी दुनिया को तुम
बाँदनी की सौगात बॉटकर
सुकून देते हो
मुझे भी पता बता दो
सुकून के खजाने का।
चाँद ने मुस्करा कर कहा -
सुकून के पल तो छिपे होते हैं
रोजमर्रा की जिन्दगी में
उन पलों को पूरे दिल से जीने से
उन पलों का जमा करने से
बनता है चैन का खजाना।
यह कहकर चाँद बादलों में छिप गया
और मैं चला और ऊपर ।
कवि ने अपनी अनुभूतियों एवं जीवन के एहसासों व विभिन्न दृश्यों को कविता के रूप में पिरोये हैं।
बगीचे मेज
ब शाम के वक्त
दरख्तों के साए
लंबे हो जाते हैं
तब मैं वहाँ खोजता हूँ
माजी के पल
वे मिलते है कभी
डालियों टूटकर गिरे
पत्तों की शक्ल में
फूलों से टूटकर गिरी
पंखुड़ियों की शक्ल में कभी।
इसी तरह जिंदगी से बाहर नहीं हूँ मैं कविता में भी कवि ने जिंदगी की स्मृतियों को जिसमें कवि डूबते-उतरते है उनको पक्तियों में संवारा है।
एक अधुरी कहानी के अलावा भी
बहुत कुछ है मेरे पास
नीम अंधेरे कमरे में
मेज पर बिखरे अधलिखे पन्ने
कलम सिगरेट कैस माचिस की डिबिया
टेबल लैम्प कुछ तसवीरे
और दीवार के साथ तरतीबवार
रखी किताबें
मीठी तेज काफी जैसी कुछ मीठी कुछ तीखी स्मृतियाँ
कुछ रंगीन सपने
जिन्हे तह करके
मैं हमेशा अपनी कमीज की जेब में रखता हूँ
और कमरे में फैली
दोस्तों के प्यार की खुशबू ।
कवि ने अवसाद के ऊपर भी कविता लिखी है क्योंकि इस वर्तमान समय में लोग अक्सर अवसाद में घिर आते है और उनके लिए जीवन स्वाभाविक नहीं रह पाता ।
सब कुछ सामान्य था
जब मैं हुआ प्रविष्ट
उस काल वलय में
बहुत चहल-पहल थी वहाँ
सभी थे खुश और बातचीत में मशगूल
मैं बिल्कुल अकेला
और
बाहर सब कुछ स्वाभाविक था
लेकिन मेरे भीतर था
तेज अंधड़ और घना अंधेरा।
कवि नीरज मनजीत ने अपनी काव्य-सर्जना के दौरान अपनी लेखनी में वातावरण, परिवेश, वर्तमान स्थिति, वैश्विक समस्याएँ, मानव मूल्यों का हास, आतंकवाद की समस्या, भूमण्डलीकरण सभी पर अपनी लेखनी चलायी है। लेकिन इसके साथ ही सुन्दर - सुन्दर बाग-बगीचे, प्रक्ति, आकाशगंगा, मन की भावनाएँ, फूल, पत्नी सभी पर अपने विचारों व भावनाओं को अपने कलम से अभिव्यक्ति देनी चाही है ।
निष्कर्ष:
हम कह सकते हैं कि नीरज मनजीत एक विषय के कवि नहीं बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं, जिन्होंने अपने कविता के माध्यम से पाठकजन को प्रकृति, ज्ञान व प्रेम की त्रिपथगा में बांधकर सात्विक भाव की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया है।
सन्दर्भ ग्रन्थ:
1. अध्यात्म व प्रेम नीलमणि कविता संग्रह ।
2. विज्ञान व प्रेम नीलमणि कविता संग्रह ।
3. प्रेम और प्रकृति नीलमणि कविता संग्रह ।
4. ग्लेशियर कविता संग्रह ।
5. कविता खिलती है कविता संग्रह ।
6. जिन्दगी से बाहर नहीं हूं कविता खिलती है कविता संग्रह ।
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Received on 15.09.2025 Revised on 01.10.2025 Accepted on 11.10.2025 Published on 14.11.2025 Available online from November 25, 2025 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(4):219-224. DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00032 ©A and V Publications All right reserved
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